अबला और सबल ,के बीच बढ़ चली स्त्री चाँद तक ,मौन तोड़ कर …अपने सपने ख़ुद बना रही है , बुन रही है ख़ुद ही … चूल्हा चौकी से बाहर एक संसार ,वो सफ़ल हो रही है हर कदम पर ,पुरुष का पौरुष भी उन से हैं ,उस वृक्ष का सृजन वही हैं ,उसे नहीं चाहिए , पत्थरों में लोग उसे पूजें पूजा पाषाण खण्डों की मोहताज़ नहीं ,पूजा फूल ,फल , रौली की मोहताज़ भी नहीं ,प्रकृति ने जिसे बनाया है वो नायाब है , अद्वितीय है , वो पूजनीय है ,स्त्री पुरुष पूरक हैं एक दूजे के ,श्रेष्ठ बनने के चक्कर में हम भूल गए ,खुद के पूरक होने को , सभ्यताएँ बीत गई बरसों की ,हम कब बदलेंगे ?? नहीं जानता …? माणिक्य बहुगुना

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